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घरघोड़ा जनपद में 7 लाख का ‘वाहन खेल’ निष्पक्ष जांच की मांग?

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आवास शाखा को राशि मिली 2024 में, तो खर्च के दस्तावेजों में 2023 के बिल कैसे? मोटरसाइकिल से लेकर पिकअप और छोटा हाथी तक के नाम पर भुगतान का आरोप !!

घरघोड़ा/न्यूज०डेस्क/09/07/2026

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जनपद पंचायत घरघोड़ा की आवास शाखा में सरकारी राशि के खर्च को लेकर सामने आए दस्तावेज कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। आरोप है कि कार्यालयीन व्यय और प्रचार-प्रसार के लिए आवंटित करीब 7 लाख रुपये की राशि वाहन खर्च के नाम पर खपा दी गई। मोटरसाइकिल से लेकर पिकअप और छोटा हाथी तक—अलग-अलग वाहनों के बिल लगाकर भुगतान दर्शाए जाने का दावा किया जा रहा है।

लेकिन इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल तारीखों के खेल को लेकर है।

जब आवंटन वर्ष 2024 में मिला, तो खर्च में वर्ष 2023 के बिल कहां से आ गए?

यदि R.T.I. में उपलब्ध कराए गए दस्तावेज सही हैं तो यह केवल सामान्य लापरवाही का मामला नहीं माना जा सकता। सवाल यह भी है कि क्या पुरानी तारीखों के बिलों को बाद में मिली सरकारी राशि के खर्च में समायोजित किया गया? यदि ऐसा हुआ तो किस अधिकारी के आदेश पर हुआ और भुगतान को मंजूरी किसने दी?

प्रचार की राशि या वाहनों का पेट्रोल पंप?

सरकारी राशि कार्यालयीन कार्य और योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए थी, लेकिन आरोप है कि लगभग पूरी राशि को वाहन व्यय में समेट दिया गया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर आवास शाखा ने ऐसा कौन-सा अभियान चला दिया था कि लाखों रुपये वाहनों पर ही खर्च हो गए?

  • क्या इन वाहनों की कोई लॉगबुक है?
  • क्या वाहन चलने का रूट चार्ट उपलब्ध है?
  • क्या यात्रा आदेश जारी किए गए थे?
  • क्या वाहन मालिकों के बैंक खातों में वास्तविक भुगतान हुआ?
  • और सबसे बड़ा सवाल—जिन ग्रामीणों को बिलासपुर ले जाने की बात कही जा रही है, वे ग्रामीण आखिर हैं कौन?

दस्तावेजों में कथित तौर पर ग्रामीणों को बिलासपुर ले जाने का उल्लेख बताया जा रहा है, जबकि आरोप है कि धरातल पर ऐसी कोई यात्रा हुई ही नहीं। यदि यह आरोप सही है तो फिर बिल किस यात्रा के हैं और सरकारी खजाने से भुगतान किस आधार पर किया गया?

  • मोटरसाइकिल, पिकअप और छोटा हाथी—आखिर कहां दौड़े?

वाहन खर्च के नाम पर अलग-अलग प्रकार के वाहनों के बिल सामने आने का दावा किया जा रहा है। सवाल यह है कि इन वाहनों का उपयोग किस तारीख को, किस स्थान से किस स्थान तक और किस सरकारी कार्य के लिए किया गया?

सरकारी भुगतान केवल बिल लगा देने से जायज नहीं हो जाता। प्रत्येक भुगतान के पीछे स्वीकृति, कार्य का उद्देश्य, यात्रा का विवरण और सत्यापन आवश्यक होता है।

यदि वाहन वास्तव में चले हैं तो उनके मालिक सामने आएं, भुगतान के अभिलेख सामने आएं और जिन ग्रामीणों ने यात्रा की उनके नाम सार्वजनिक जांच का हिस्सा बनाए जाएं। लेकिन यदि वाहन केवल कागजों में दौड़े हैं, तो मामला सीधे सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग की ओर इशारा करता है।

  • सात लाख के खर्च का हिसाब कौन देगा?

यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि राशि छोटी नहीं है। लगभग सात लाख रुपये सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक कार्यों के लिए जनता के पैसे से दिए गए थे।

अब जनपद पंचायत प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि कितनी राशि किस वाहन पर खर्च हुई, कितने दिन वाहन लगाए गए, किस अधिकारी ने वाहन की आवश्यकता बताई, किसने बिल सत्यापित किया और किस अधिकारी ने अंतिम भुगतान की स्वीकृति दी?

  • सवालों की लंबी सूची है, लेकिन जवाब फिलहाल दस्तावेजों के ढेर में दबे नजर आ रहे हैं।
  • जांच केवल फाइलों की नहीं, वाहन मालिकों और ग्रामीणों की भी हो

मामले की निष्पक्ष जांच के लिए केवल कार्यालय में बैठकर बिल और वाउचर देख लेना पर्याप्त नहीं होगा। जांच टीम को प्रत्येक वाहन मालिक का बयान लेना चाहिए। वाहन के पंजीयन विवरण का सत्यापन किया जाना चाहिए। जिन ग्रामीणों को बिलासपुर ले जाने का दावा किया गया है, उनसे व्यक्तिगत रूप से पूछताछ होनी चाहिए।

  • साथ ही यात्रा आदेश, वाहन लॉगबुक, भुगतान वाउचर, बैंक लेन-देन और स्वीकृति आदेश का आपस में मिलान होना चाहिए।
  • तभी साफ होगा कि वाहन वास्तव में सड़कों पर दौड़े थे या सिर्फ सरकारी फाइलों में।

जिम्मेदारी किसकी? प्रशासन कब खोलेगा फाइल?

पूरे मामले में अब जिला प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। यदि आवंटन वर्ष और खर्च के बिलों की तारीखों में अंतर है तो इसकी जांच तत्काल होनी चाहिए।

जनता के पैसे का हिसाब जनता को मिलना चाहिए। सवाल पूछना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सरकारी योजनाओं में एक-एक रुपये की कमी का असर गरीब हितग्राहियों पर पड़ता है।

  • अब गेंद प्रशासन के पाले में है।
  • क्या 7 लाख रुपये के कथित वाहन खर्च की जांच होगी?
  • क्या वाहन मालिकों और ग्रामीणों के बयान लिए जाएंगे?
  • क्या वर्ष 2024 के आवंटन और वर्ष 2023 के बताए जा रहे बिलों की गुत्थी सुलझेगी?
  • या फिर फाइलों में दौड़ते वाहन सरकारी व्यवस्था की धूल में गायब हो जाएंगे?

 

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