🔥🔥रियासत कालिन तहसील मुख्यालय घरघोड़ा में शासकीय भूमि की कोई कमी नही थी जिम्मेदार तत्कालीन अधिकारी व भू – कब्जाधारीयों ने आम जनता की बेशकीमती जमीन को डकार गये.. शासन प्रशासन देखता रहा .. तब – आज ?? इतिहास के पन्नों पर ..👀👀
🔥🔥नगर में दो कानून? गरीब की दुकान पर बुलडोजर, रसूखदार का बेजाकब्जा जायज?👀👀
🔥🔥अंधेर नगरी चौपट राजा के खिलाफ मुख्यमंत्री हेल्पलाइन एवं कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत की तैयारी👀👀
घरघोड़ा/संपादक की कलम से/कुहुक-कानन.निष्पक्ष_बेबाक_कलम
घरघोड़ा नगर में शासकीय एवं नगर पंचायत की भूमि पर कथित अवैध कब्जों को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। नगरवासियों का आरोप है कि गरीब और छोटे फुटकर व्यवसायियों के लिए अलग नियम तथा प्रभावशाली एवं संपन्न लोगों के लिए अलग व्यवस्था लागू होती दिखाई दे रही है। यही कारण है कि नगर में अब यह चर्चा आम हो चली है कि क्या वास्तव में कानून सबके लिए समान है या फिर रसूख और पहुंच के आधार पर उसका स्वरूप बदल जाता है?
घरघोड़ा तहसील कार्यालय का इतिहास लगभग एक शताब्दी पुराना है। वर्ष 1928 से संचालित यह तहसील कार्यालय क्षेत्र की प्रशासनिक पहचान रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद वर्ष 2000 में यहां अनुविभागीय राजस्व कार्यालय की स्थापना हुई राजस्व मामले पर त्वरित निस्तारण व क्षेत्र को विकास के साथ जोड़कर तेज गति से फैसला जमीं पर दिखाई दे इसके लिए एसडीएम को बैठाया गया ज़िले के प्रमुख राजस्व कार्यालय में से एक घरघोड़ा तहसील है जहां आइएएस अधिकारीयों की पोस्टिंग होती रही है ऐसा तब होता है जब जिले का दर्जा अनुरूप क्षेत्र को राज्य शासन आवश्यक कार्यप्रणाली में रखतीं हैं। उसके उलट आज घरघोड़ा जैसा आदिवासी औद्योगिक व खनिज संपदा से परिपूर्ण क्षेत्र अपनी बदहाली व अव्यवस्था पर रोना रो रहा है।
घरघोड़ा तहसील कार्यालय पिछले 26 वर्षों से एसडीएम (सब डिवीजन मजिस्ट्रेट) के माध्यम से पूरे क्षेत्र के राजस्व एवं प्रशासनिक कार्यों का संचालन किया जा रहा है। इसके बावजूद नगर और आसपास के क्षेत्र में विकास, शहरी नियोजन तथा शासकीय भूमि संरक्षण को लेकर लगातार गंभीर प्रश्न उठते रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि घरघोड़ा राजस्व अनुभाग के अंतर्गत तमनार एवं घरघोड़ा विकासखंड आते हैं, जहां देश की बड़ी खनन और औद्योगिक परियोजनाएं संचालित हैं। क्षेत्र में कोयला खदानों, ऊर्जा संयंत्रों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों से करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। इसके बावजूद नगर की आधारभूत सुविधाओं, यातायात व्यवस्था, भूमि प्रबंधन तथा अवैध कब्जों पर नियंत्रण की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देती है।
नगरवासियों के अनुसार तहसील कार्यालय से लगी नगर पंचायत की भूमि पर एक निर्माणाधीन दुकान को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि संबंधित निर्माण कार्य के विरुद्ध अनुविभागीय अधिकारी राजस्व (एसडीएम) कार्यालय में लिखित शिकायत दी गई, किंतु शिकायत के बाद भी निर्माण कार्य पर प्रभावी रोक नहीं लगाई गई। इससे आम जनता में यह संदेश जा रहा है कि शिकायतों के बावजूद प्रशासन कार्रवाई करने में असहाय या अनिच्छुक दिखाई दे रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि कोई गरीब व्यक्ति सड़क किनारे गुमटी, ठेला या छोटी दुकान लगाता है तो उसके खिलाफ तत्काल अभियान चलाकर हटाने की कार्रवाई कर दी जाती है। कई बार अतिक्रमण हटाने के नाम पर गरीब परिवारों की आजीविका तक प्रभावित हो जाती है। लेकिन जब मामला किसी प्रभावशाली व्यक्ति अथवा पूंजीपति से जुड़ा होता है तो वही प्रशासनिक व्यवस्था मौन क्यों हो जाती है? यही प्रश्न आज नगरवासियों के मन में सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है।
नागरिकों का आरोप है कि नगर पंचायत, राजस्व विभाग तथा अन्य संबंधित विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण शासकीय एवं सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर अवैध कब्जों की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। यदि समय रहते ऐसे मामलों पर सख्ती नहीं बरती गई तो भविष्य में नगर की सार्वजनिक संपत्तियों को बचाना और भी कठिन हो जाएगा।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि घरघोड़ा जैसे औद्योगिक और राजस्व दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र में भूमि प्रबंधन की पारदर्शी व्यवस्था आवश्यक है। शासकीय भूमि, सड़क, चौक-चौराहे, सार्वजनिक उपयोग की जगहें और नगर पंचायत की संपत्तियां किसी भी नगर के विकास की आधारशिला होती हैं। यदि इन पर अवैध कब्जे होते रहे तो आने वाली पीढ़ियों को उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
इस पूरे मामले को लेकर नगरवासियों ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन, कलेक्टर जनदर्शन तथा उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराने की बात कही है। लोगों की मांग है कि संबंधित भूमि की स्थिति का राजस्व अभिलेखों के आधार पर निष्पक्ष परीक्षण कराया जाए और यदि किसी प्रकार का अवैध निर्माण पाया जाता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि कार्रवाई गरीब और अमीर, दोनों के लिए समान रूप से लागू हो।
आज आवश्यकता केवल किसी एक निर्माण को रोकने की नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर जनता के विश्वास को बनाए रखने की है। यदि कानून का पालन सभी के लिए समान रूप से होगा तभी लोकतंत्र और सुशासन की भावना मजबूत होगी। अन्यथा “अंधेर नगरी चौपट राजा” जैसी कहावतें केवल कहावत नहीं बल्कि व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर बनकर सामने आती रहेंगी।
घरघोड़ा के नागरिकों का कहना है कि अन्याय के विरुद्ध संगठित होकर आवाज उठाना ही लोकतांत्रिक अधिकार है। यदि नगरवासी सार्वजनिक संपत्तियों की रक्षा और पारदर्शी प्रशासन की मांग को लेकर एकजुट होते हैं तो निश्चित रूप से भविष्य की दिशा बदली जा सकती है। सवाल केवल एक दुकान का नहीं, बल्कि पूरे नगर के भविष्य और प्रशासनिक जवाबदेही का है।