तंबाकू मुक्त कार्यक्रम बना मज़ाक़, शासन – प्रशासन को मुंह चिढ़ाता गली गली में सजा ज़र्दा की लड़ियां।
स्वस्थ्य समाज की परिकल्पना करना कलयुग में सभंव नही ? शासन – प्रशासन के लिए नशें का कारोबार मतलब राजस्व आय की सोने की अंडा।
हर साल वही बैठक, वही सख्त निर्देश, वही बड़े-बड़े दावे… लेकिन सवाल यह है कि आखिर बदलता क्या है?
रायगढ़/ खबर डेस्क/ 13/07/2026
एक ओर जिला प्रशासन तंबाकू मुक्त जिला बनाने का संकल्प दोहराता है, दूसरी ओर सरकारी कार्यालयों, स्कूलों और महाविद्यालयों के आसपास खुलेआम तंबाकू और गुटखा बिकता दिखाई देता है। यदि कानून लागू है तो उसका पालन कौन कराएगा? और यदि पालन नहीं हो रहा, तो हर साल होने वाली बैठकों का औचित्य क्या है।

प्रशासनिक बैठकों में अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए जाते हैं कि शिक्षण संस्थानों के 100 मीटर के दायरे में तंबाकू बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित रहे। मगर जमीनी तस्वीर इसके विपरीत दिखाई देती है। कई स्थानों पर नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं और जिम्मेदार विभाग मूकदर्शक बने हुए हैं।
आमजन का कहना है कि सार्वजनिक स्थानों पर तंबाकू नियंत्रण को लेकर न्यायालयों के निर्देश और कानून वर्षों से लागू हैं, फिर भी कार्रवाई केवल कागजों तक क्यों सीमित है? क्या कानून सिर्फ आम नागरिकों के लिए है और नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई से प्रशासन बचता है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि हर वर्ष समीक्षा बैठकों के बाद भी हालात जस के तस हैं, तो जवाबदेही किसकी तय होगी? क्या कभी उन अधिकारियों से भी पूछा जाएगा जिनके कार्यक्षेत्र में प्रतिबंधित स्थानों पर खुलेआम तंबाकू बिकता रहा?
यह केवल रायगढ़ का मुद्दा नहीं, बल्कि प्रदेश के अनेक जिलों की तस्वीर है। स्कूलों के बाहर गुटखा, पान मसाला और तंबाकू की बिक्री आज भी आम बात है। ऐसे में “तंबाकू मुक्त जिला” का नारा तब तक खोखला ही माना जाएगा, जब तक कार्रवाई कागजों से निकलकर सड़क पर दिखाई नहीं देती। जनता का सीधा सवाल है क्या प्रशासन वास्तव में तंबाकू मुक्त समाज बनाना चाहता है, या फिर हर साल बैठकें कर उपलब्धियां गिनाने की औपचारिकता निभाई जा रही है?
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