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किसानों के सवालों के बीच बीएस स्पंज की जनसुनवाई: जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर उठे सवाल, ग्रामीणों ने मांगी सुनवाई रद्द करने की मांग

कंपनी के खिलाफ जन आंदोलन की तैयारी किसान गुहार ना सुनने पर आत्मादाह की चेतावनी?

नवापारा-टेंडा में प्रस्तावित परियोजना को लेकर बढ़ा विरोध; भूमि रिकॉर्ड, वन क्षेत्र, हाथी आवागमन और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर ग्रामीणों की आपत्तियां

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घरघोड़ा/रायगढ़/न्यूज संपादक 

घरघोड़ा तहसील के नवापारा (टेंडा)-चारमार क्षेत्र में प्रस्तावित बीएस स्पंज परियोजना की पर्यावरणीय जनसुनवाई को लेकर ग्रामीणों और किसानों का विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय, भूमि और आजीविका संबंधी सवालों का समाधान किए बिना जनसुनवाई कराने की जल्दबाजी क्यों की जा रही है।

ग्रामीणों ने परियोजना स्थल के आसपास वन क्षेत्र, हाथियों के आवागमन, कृषि भूमि, जल स्रोत और स्थानीय पर्यावरण पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि क्षेत्र पहले से ही औद्योगिक गतिविधियों और भारी वाहनों के दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे में नई परियोजना के प्रभाव का स्वतंत्र और तथ्यात्मक मूल्यांकन आवश्यक है।

भूमि रिकॉर्ड भी विवाद के केंद्र में

इसी बीच एक प्रभावित पक्ष द्वारा कलेक्टर रायगढ़ के समक्ष प्रस्तुत आवेदन में वर्ष 1979 से वर्तमान तक मूल खसरा नंबर 86 और उससे जुड़े उप-खसरों के राजस्व रिकॉर्ड की विस्तृत जांच की मांग की गई है।

आवेदक के अनुसार समय-समय पर हुए बंटवारे, नामांतरण, विक्रय और अन्य हस्तांतरणों के कारण वर्तमान रिकॉर्ड में बदलाव आया है। आवेदन में खसरा-वार और दस्तावेज-वार मिलान कराने तथा संबंधित राजस्व अभिलेखों की जांच की मांग की गई है।

आवेदन में 1/2 बंटवारा प्रकरण, फौती एवं उत्तराधिकार संबंधी प्रविष्टियों की जांच की मांग भी की गई है। आवेदक का कहना है कि संबंधित व्यक्तियों के निधन के बाद उनके वैधानिक उत्तराधिकारियों के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किए गए थे या नहीं, इसका परीक्षण होना चाहिए।

2012 के रेलवे मुआवजे का रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में

आवेदन में वर्ष 2012 में रेलवे द्वारा किए गए भूमि अधिग्रहण से संबंधित रिकॉर्ड की जांच की मांग भी की गई है। इसमें अधिग्रहण अधिसूचना, अवार्ड, खसरा-वार रकबा, मुआवजा भुगतान और मुआवजा प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के रिकॉर्ड का परीक्षण कराने की मांग की गई है।

आवेदक ने यह भी मांग की है कि यदि किसी वास्तविक हिस्सेदार को उसके वैधानिक हिस्से का मुआवजा नहीं मिला है, तो संबंधित रिकॉर्ड की जांच की जाए।

बीएस परियोजना से जुड़ी जमीन पर भी सवाल

आवेदन में दावा किया गया है कि मूल खसरा नंबर 86 से निर्मित कुछ भूमि बीएस इस्पात द्वारा खरीदी गई है। इस भूमि से जुड़े विक्रय दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड की जांच की मांग की गई है।

साथ ही 28 सितंबर 2026 को प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई के संदर्भ में भी कलेक्टर से हस्तक्षेप का आग्रह किया गया है। आवेदक ने मांग की है कि भूमि स्वामित्व और लंबित राजस्व विवाद से जुड़े तथ्यों को जनसुनवाई के रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए तथा सक्षम प्राधिकारी द्वारा वैधानिक कार्रवाई की जाए।

यथास्थिति बनाए रखने की मांग

आवेदन में संबंधित भूमि के सीमांकन और राजस्व विवाद के अंतिम निराकरण तक यथास्थिति बनाए रखने की मांग की गई है। निर्माण अथवा भूमि की प्रकृति में परिवर्तन पर अंतरिम रोक लगाने तथा पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध किया गया है।

आवेदन में खसरा नंबर 86/7, 86/33, 86/1, 86/2, 86/3, 86/4, 86/5, 86/6, 86/8, 86/10, 86/11, 86/12, 86/14, 86/15, 86/19, 86/20, 86/25, 86/31, 86/34, 86/35, 86/36, 86/37, 86/38 और 86/42 सहित संबंधित उप-खसरों के हस्तांतरण की जांच की मांग की गई है।

पर्यावरण और हाथी आवागमन पर भी चिंता

ग्रामीणों का कहना है कि टेंडा-नवापारा क्षेत्र में वन क्षेत्र और हाथियों के आवागमन को देखते हुए परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का गंभीर परीक्षण जरूरी है। उनका सवाल है कि यदि क्षेत्र हाथियों के आवागमन वाले मार्ग के रूप में उपयोग होता है, तो औद्योगिक परियोजना से मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

ग्रामीणों ने क्षेत्र में पहले से मौजूद उद्योगों, खदानों और भारी वाहनों के कारण प्रदूषण, सड़क सुरक्षा, धूल और कृषि पर पड़ रहे प्रभावों का भी मुद्दा उठाया है।

जनसुनवाई को लेकर ग्रामीणों का रुख

ग्रामीणों का कहना है कि केवल जनसुनवाई आयोजित कर लेना पर्याप्त नहीं है। भूमि विवाद, पर्यावरणीय प्रभाव, वन एवं वन्यजीव, जल उपयोग, किसानों की आपत्तियां और स्थानीय रोजगार जैसे मुद्दों पर स्पष्ट जवाब सार्वजनिक रूप से सामने आना चाहिए।

कुछ ग्रामीणों ने परियोजना के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए कथित रूप से प्रलोभन अथवा आर्थिक प्रभाव का आरोप लगाया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है। प्रशासन और कंपनी का पक्ष इस विषय में सामने आना महत्वपूर्ण होगा।

जनसुनवाई सफल होने के बाद भी आंदोलन की चेतावनी

ग्रामीणों का कहना है कि यदि 28 सितंबर को प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई प्रशासनिक स्तर पर सफल घोषित भी कर दी जाती है, तो इससे उनका विरोध समाप्त नहीं होगा। ग्रामीणों के अनुसार, उनकी भूमि, पर्यावरण, वन क्षेत्र, हाथी आवागमन और अन्य स्थानीय समस्याओं का समाधान हुए बिना परियोजना के खिलाफ संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और विरोध जारी रहेगा।

ग्रामीणों का आरोप है कि जनसुनवाई को लेकर क्षेत्र में कथित रूप से समर्थन जुटाने और लोगों को प्रभावित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। कुछ किसानों ने खरीद-फरोख्त तथा आर्थिक प्रलोभन दिए जाने के आरोप भी लगाए हैं। उनका दावा है कि लोगों को कथित रूप से गुमराह कर जनसुनवाई के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है और इसके लिए नकद राशि अथवा अन्य प्रलोभन दिए जाने की शिकायतें सामने आई हैं।

इन आरोपों में यह भी दावा किया जा रहा है कि कंपनी से जुड़े कुछ लोगों और अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध है। हालांकि, किसी अधिकारी या कंपनी प्रतिनिधि द्वारा रिश्वत अथवा दलाली किए जाने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे आरोपों की निष्पक्ष जांच और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना जरूरी है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन ने उनकी आपत्तियों और शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया तो आने वाले दिनों में आंदोलन और व्यापक हो सकता है। उनका स्पष्ट कहना है कि जनसुनवाई की प्रक्रिया पूरी हो जाने मात्र से उनकी आपत्तियां समाप्त नहीं मानी जाएंगी।

अब सवाल यह भी है कि यदि जनसुनवाई के दौरान ग्रामीणों द्वारा उठाई गई आपत्तियों को रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है, तो उन पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा क्या कार्रवाई की जाएगी? क्या भूमि विवाद, पर्यावरणीय प्रभाव, वन क्षेत्र, हाथी आवागमन और किसानों की आपत्तियों का स्वतंत्र परीक्षण होगा? या फिर जनसुनवाई को केवल एक औपचारिक प्रक्रिया मानकर परियोजना को आगे बढ़ा दिया जाएगा?

इस पूरे मामले में जिला प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और बीएस स्पंज प्रबंधन का आधिकारिक पक्ष सामने आना महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से आर्थिक प्रलोभन, कथित खरीद-फरोख्त और अधिकारियों की भूमिका से जुड़े आरोपों पर संबंधित पक्षों की स्पष्ट प्रतिक्रिया आवश्यक है।”

अब प्रशासन के सामने कई सवाल

28 सितंबर की प्रस्तावित जनसुनवाई से पहले प्रशासन के सामने प्रमुख सवाल हैं –

क्या प्रभावित किसानों की भूमि संबंधी आपत्तियों का दस्तावेजी परीक्षण किया गया है?

खसरा नंबर 86 से जुड़े पुराने राजस्व रिकॉर्ड का मिलान कब और किस स्तर पर होगा?

2012 के रेलवे भूमि अधिग्रहण एवं मुआवजा रिकॉर्ड की जांच होगी या नहीं?

परियोजना स्थल और आसपास के वन क्षेत्र तथा हाथी आवागमन के संबंध में स्वतंत्र सत्यापन हुआ है या नहीं?

ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच कौन करेगा?

जनसुनवाई में प्राप्त प्रत्येक आपत्ति को रिकॉर्ड में दर्ज कर उसका जवाब दिया जाएगा या नहीं?

फिलहाल ग्रामीणों का विरोध यह संकेत दे रहा है कि मामला केवल एक औद्योगिक परियोजना की जनसुनवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि भूमि अधिकार, पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय लोगों की भागीदारी से जुड़े व्यापक सवालों में बदल चुका है।

बीएस स्पंज प्रबंधन और जिला प्रशासन का आधिकारिक पक्ष इस रिपोर्ट में शामिल किया जाना शेष है। उनके जवाब मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।

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